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बसना : एक माह बाद बरसे बादल, किसानों पर दोहरी मार; सूखती फसल को राहत, पकते धान पर आफत

  • समय पर बारिश होती तो सिंचाई के खर्च और रातभर की मशक्कत से बच जाते किसान
  • खेतों में गिरी धान की फसल, सड़ने का खतरा बढ़ा; कटाई के लिए चेन हार्वेस्टर का सहारा लेने पर बढ़ेगा खर्च
  • बोरवेल, बिजली और पानी के इंतजाम में पहले ही बेहाल किसानों की बढ़ीं मुश्किलें

बसना अंचल में एक माह से अधिक समय तक बारिश का इंतजार कर रहे किसानों के लिए 28 अक्टूबर को बरसे बादल राहत से ज्यादा आफत लेकर आया। 25 सितंबर के बाद बुधवार को हुई बारिश ने जहां सिंचाई के अभाव में दम तोड़ रही धान की फसल को कुछ राहत दी, वहीं पककर तैयार हो रही फसल के लिए नई मुसीबत खड़ी कर दी। खेतों में धान की बालियां निकल चुकी हैं और कई जगह फसल पकने की अवस्था में है। ऐसे समय बारिश के साथ हवा चलने से धान के पौधे खेतों में गिर गए। इससे फसल के सड़ने, दानों की गुणवत्ता प्रभावित होने और कटाई में अतिरिक्त खर्च आने की आशंका बढ़ गई है। किसानों के सामने अब दोहरी चुनौती है। एक ओर खेतों में गिरी फसल को बचाना, दूसरी ओर पहले से ही सिंचाई पर हो चुके अतिरिक्त खर्च के बीच कटाई की बढ़ती लागत का इंतजाम करना।

खेती के लिहाज से यह बारिश यदि 15 से 20 दिन पहले हो गई होती तो किसानों को सिंचाई के लिए इतनी जद्दोजहद नहीं करनी पड़ती। बारिश के अभाव में किसानों को बोरवेल चलाने के लिए बिजली की समस्या से जूझना पड़ा। जिन खेतों में स्वयं के सिंचाई साधन नहीं थे, वहां नदी-नालों और पोखरों से पानी लाने के लिए पाइप खरीदने पड़े। कई किसानों को दूसरे किसानों के बोरवेल से पानी मांगकर खेतों तक पहुंचाना पड़ा। फसल को सूखने से बचाने के लिए रात-रातभर जागकर सिंचाई करनी पड़ी। इस पूरी कवायद में किसानों का समय, श्रम और लाखों रुपए खर्च हुआ। अब जब धान पकने की ओर है, तब हुई बारिश ने राहत के साथ नुकसान की आशंका भी बढ़ा दी है। किसानों की परेशानी इस बात से और बढ़ जाती है कि समय पर पानी मिलता तो सिंचाई पर होने वाला अतिरिक्त खर्च बच सकता था और खेतों में फसल की स्थिति भी बेहतर रह सकती थी।

विगत 25 सितम्बर को अंचल में मानसूनी बारिश थम चुकी थी। मानसून भी वापस हो चुका था। मौसम में बदलाव की शुरुआत 26 अक्टूबर की शाम आसमान में बादल छाने के साथ हुई। 27 अक्टूबर की सुबह करीब आठ बजे हल्की बूंदाबांदी हुई, जिससे मुख्य रूप से सड़कों की धूल भीगी और दिनभर आसमान में बदली छाई रही। 28 अक्टूबर को तड़के करीब चार बजे लगभग दस मिनट हल्की बारिश हुई, जिसके बाद वर्षा थम गई। धूप खिलने के करीब एक घंटे बाद आसमान से छोटी-छोटी बूंदें गिरने लगीं। कभी बूंदों की रफ्तार बढ़ती तो कभी धीमी पड़ जाती, लेकिन दोपहर एक बजे तक बारिश में विशेष तेजी नहीं आई। दोपहर करीब डेढ़ बजे के बाद हल्की बारिश शुरू हुई, जो देर शाम तक बसना अंचल में जारी रही। चक्रवाती तूफान अर्नब के प्रभाव से हो रही बारिश के बीच किसानों की निगाहें अब मौसम के अगले रुख पर टिकी हैं।

इस बारिश से उन किसानों को राहत मिली, जिनके खेतों में सिंचाई के साधन नहीं होने के कारण धान की फसल तेज धूप में झुलसकर सूखने लगी थी। हालांकि, पककर तैयार हो रही अधिकांश फसल के खेतों में गिरने से चिंता बढ़ गई है। गिरी हुई धान की फसल लंबे समय तक भीगी रहने पर उसके सड़ने और गुणवत्ता प्रभावित होने का खतरा है। वहीं, खेतों में फसल गिर जाने से सामान्य हार्वेस्टर से कटाई में परेशानी हो सकती है। ऐसी स्थिति में किसानों को चेन वाले हार्वेस्टर से कटाई करानी पड़ सकती है, जिसके लिए अधिक खर्च उठाना होगा। 

पहले ही सिंचाई के साधन जुटाने में आर्थिक बोझ झेल चुके किसानों के लिए यह अतिरिक्त खर्च नई परेशानी बन सकता है। एक माह तक बारिश नहीं होने पर किसान पानी के लिए परेशान रहे और अब फसल पकने के समय हुई बारिश ने उनकी चिंता बढ़ा दी है। खेती में बारिश का समय जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही महत्वपूर्ण फसल की अवस्था के अनुरूप मौसम का साथ मिलना भी है। समय पर हुई बारिश सूखती फसल को बचा सकती थी, लेकिन देर से बरसे बादलों ने किसानों को राहत और नुकसान के बीच खड़ा कर दिया है।


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