बसना क्षेत्र में बारिश थमी तो संकट में धान की फसल, सिंचाई के लिए दिन-रात बोरवेल चला रहे किसान
15-17 दिनों से वर्षा नहीं होने से खेतों में नमी घटी
बालियां निकलने और गर्भावस्था की अवस्था में धान को नुकसान की आशंका
लो वोल्टेज की समस्या बढ़ी, नदी-नालों और सिंचाई साधनों से वंचित खेतों में मुरझाने लगी फसल
बसना विकासखंड में मानसून के दौरान अच्छी बारिश होने के बावजूद अब वर्षा का लंबा अंतराल किसानों के लिए नई मुसीबत बन गया है। सितंबर के अंतिम सप्ताह में हुई बारिश के बाद मौसम ऐसा थमा कि पिछले 15 से 17 दिनों से पर्याप्त वर्षा नहीं हुई है। इसका सीधा असर खेतों में खड़ी धान की फसल पर पड़ने लगा है।
कहीं धान में बालियां निकल रही हैं, तो कहीं लंबी अवधि वाली किस्मों में गर्भावस्था की महत्वपूर्ण अवस्था चल रही है। ऐसे समय पौधों को पर्याप्त नमी की जरूरत होती है, लेकिन बारिश नहीं होने से किसानों की चिंता बढ़ गई है। फसल को नुकसान से बचाने के लिए किसान दिन-रात बोरवेल चलाकर सिंचाई करने में जुटे हैं। इसके बावजूद जिन खेतों तक सिंचाई के साधन नहीं पहुंच पा रहे हैं, वहां धान के पौधे मुरझाने लगे हैं।
इस वर्ष बारिश का आंकड़ा शुरुआती दौर में ही उल्लेखनीय रहा। 30 जुलाई तक वर्षभर का कुल 1077 मिलीमीटर वर्षा दर्ज हो चुकी थी। सितंबर तक बारिश औसत से अधिक होने की स्थिति भी बनी रही। जून के अंतिम सप्ताह से जुलाई तक लगातार झड़ी और मूसलाधार बारिश का दौर चला, लेकिन अधिक बारिश होने का पूरा लाभ धान की फसल को नहीं मिल सका। धान के अंकुरण पर प्रतिकूल असर पड़ने की आशंका और पौधों के छोटे होने के कारण किसानों को कई बार खेतों से अतिरिक्त पानी निकालना पड़ा।
इस दौरान बारिश का पानी खेतों से निकलकर नदी-नालों के रास्ते आगे बह गया। अब जब फसल को नमी की जरूरत है, तब बारिश का रुक जाना किसानों के सामने गंभीर चुनौती बन गया है। धान में बालियां निकलने और गर्भावस्था की अवस्था फसल उत्पादन के लिहाज से महत्वपूर्ण मानी जाती है। इस समय लंबे अंतराल तक खेतों में पर्याप्त नमी नहीं रहने से पौधों की बढ़वार, बालियों के विकास और दाने भरने पर असर पड़ने की आशंका रहती है।
किसान किसी तरह फसल को बचाने के लिए उपलब्ध संसाधनों का पूरा उपयोग कर रहे हैं। जहां बोरवेल की सुविधा है, वहां लगातार पंप चलाकर खेतों तक पानी पहुंचाया जा रहा है। नदी-नालों और तालाबों के आसपास के किसान भी पंपों या दूर में मौजूद पंप से लंबी दूरी वाले पाइप लपेटा पाईप या स्प्रिंकलर पाईप खरीद कर खेतों की सिंचाई करने में लगे हैं। जिससे किसानों की अर्थव्यवस्था पर बोझ बढ़ रहा है। किसान उधारी और कर्ज से पाइप खरीद कर खेतों की फसल बचाने जद्दोजहद कर रहे हैं।
दूसरी ओर, जिन खेतों में बोरवेल नहीं हैं और जहां नदी-नालों से पानी पहुंचाने की सुविधा उपलब्ध नहीं है, वहां किसानों की परेशानी अधिक बढ़ गई है। खेतों की नमी कम होने से धान के पौधे मुरझाने लगे हैं। लगातार बोरवेल चलने के कारण बिजली आपूर्ति पर भी दबाव बढ़ रहा है । पूरे क्षेत्र में फिर लो वोल्टेज की समस्या सामने आ रही है। इससे सिंचाई के प्रयासों में भी बाधा आ रही है। किसानों के लिए यह समय बेहद संवेदनशील है। एक ओर फसल को बचाने के लिए लगातार सिंचाई करनी पड़ रही है, वहीं दूसरी ओर बिजली की समस्या और सीमित जल संसाधन चिंता बढ़ा रहे हैं। अब किसानों की निगाहें फिर से बारिश पर टिकी हैं। यदि जल्द वर्षा नहीं हुई तो धान की पैदावार प्रभावित होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।